(नैरेशन – हल्की बारिश और सुबह की मंद धूप)
उस सुबह मौसम बेहद सुखद था। हल्की धूप चमक रही थी और बीच-बीच में हल्की फुहारें वातावरण को ठंडा कर रही थीं।
कल की बेचैनी के बाद आज रूद्र का मन कुछ शांत लग रहा था।
सुबह उठकर उसने अपना रोज़ का काम निपटाया और कॉलेज जाने की तैयारी की।
पहले सेमेस्टर की परीक्षा में बस एक महीना बचा था। कुछ दिनों से पढ़ाई पर उसका ध्यान कम रहा था, इसलिए आज वह दोस्तों से नोट्स लेने निकला था ताकि पढ़ाई शुरू कर सके।
लेकिन जैसे ही वह क्लास में पहुँचा, किसी ने उसे बताया—
“रूद्र, तुम्हें प्रिंसिपल ऑफिस में बुलाया गया है।”
रूद्र बिना कुछ बोले ही बाहर निकल पड़ा।
रास्ते में कॉलेज का बुज़ुर्ग चपरासी उसे देखकर बोला—
“बेटा, थोड़ा संभलकर जाना… जिसके साथ कल तुम्हारी लड़ाई हुई थी ना, उसके माता-पिता आज आए हैं। वो बहुत गुस्से में हैं।
मेरी मानो तो उनसे माफ़ी मांग लेना।”
रूद्र ने शांति से कहा—
“काका, मैंने गलत कुछ किया ही नहीं… तो माफ़ी क्यों मांगूँ?
सच के लिए खड़े होना सीख चुका हूँ मैं।”
चपरासी ने दुख भरी आवाज़ में कहा—
“बेटा, हम जैसे गरीब लोगों के लिए सच कभी-कभी भारी पड़ जाता है।
अमीरों के लिए नियम-कानून भी अलग चल जाते हैं।”
रूद्र ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
“जो भी हो, काका… आज मैं झुकूँगा नहीं। धन्यवाद आपकी सलाह के लिए।”
वह अंदर गया। प्रिंसिपल के सामने एक महिला, उसका पति और वही लड़का बैठे थे जिससे कल झगड़ा हुआ था।
पास में खड़ी वह टीचर भी थी जिसने कल रूद्र को धमकाया था।
रूद्र ने दरवाज़ा खटखटाया—
“May I come in, sir?”
प्रिंसिपल ने कहा—
“Come in, Rudra.”
रूद्र ने शांत स्वर में पूछा—
“Good morning, sir… आपने मुझे बुलाया था?”
प्रिंसिपल कुछ कहते, उससे पहले ही वह महिला गुस्से में खड़ी हो गई—
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर हाथ उठाने की! मैं तुम्हें छोड़ने वाली नहीं!”
रूद्र कुछ कह पाता इससे पहले ही वह महिला गुस्से में उसके करीब आई।
तनाव बढ़ चुका था। प्रिंसिपल ने स्थिति संभालने की कोशिश की लेकिन माहौल और गर्म होता गया।
महिला का पति उसे पकड़कर बैठाता है और कहता है—
“शांत हो जाओ… पहले बात समझ लेते हैं।”
वह लड़का भी रोता हुआ बोला—
“माँ! चलो यहां से… यह फिर से मुझे मारेगा…”
तीनों गुस्से में ऑफिस छोड़कर बाहर चले गए।
जाते-जाते महिला ने पीछे मुड़कर कहा—
“रूद्र… यह खत्म नहीं हुआ है। देखते जाओ, आगे क्या होता है!”
उनके जाते ही प्रिंसिपल ने थके हुए स्वर में कहा—
“रूद्र… ये लोग बहुत प्रभावशाली हैं। मैं हालात संभालने की कोशिश करूँगा… पर तुम्हें भी अपने गुस्से पर काबू रखना होगा।”
रूद्र ने बस इतना कहा—
“मैंने गलत कुछ नहीं किया, सर।”
और वह बाहर निकल गया।
क्लास में पहुँचकर वह अपनी सीट पर बैठ गया।
उसका चेहरा गंभीर था।
उसके एक सहपाठी ने हिम्मत करके पूछा—
“रूद्र… तुम ठीक हो?”
रूद्र मुस्कुरा दिया—
“अरे, तुम्हें क्या लगता है? मैं यहाँ रोने के लिए आया हूँ?”
दोनों हँस पड़े और माहौल हल्का हो गया।
पूरा दिन पढ़ाई में बीत गया।
आज डिंपल भी असामान्य रूप से शांत थी — न कोई उलझन, न कोई ताना।
क्लास खत्म होते ही रूद्र अपने हॉस्टल लौट आया।
वहाँ उसका रूम पार्टनर सिर झुकाए बैठा था।
रूद्र ने पूछा—
“क्या हुआ? उदास क्यों हो?”
वह बोला—
“यार… आज मैंने एक लड़की को प्रपोज़ किया था। उसने सबके सामने बोल दिया कि मैं उसकी हैसियत का नहीं हूँ…”
रूद्र ने हँसते हुए कहा—
“अरे भाई… एक लड़की ने मना कर दिया तो दुनिया खत्म नहीं हो जाती। चल उठ—आज बाहर घूमने चलते हैं।”
दोनों हंसते हुए कमरे से बाहर निकल गए।
लेकिन उन्हें क्या पता…
उन्हीं के पीछे कुछ लोग नजर गड़ाए बैठे थे।
किसी ने फ़ोन पर कहा—
“सर… मुझे नहीं लगता यह वही लड़का है। इसकी हरकतें मेल नहीं खातीं। क्या आप दोबारा इससे जुड़े रिकॉर्ड चेक करवाना चाहेंगे?”
दूसरी तरफ एक ठंडी, डरावनी आवाज़ आई—
“तुम मुझे बताओगे… कि मुझे क्या करना है?
चुपचाप मेरे पास आओ। तुम्हें याद दिलाना होगा कि तुम किसके आदमी हो।”
कॉल कट गया।
थोड़ी देर बाद…
एक जंगलनुमा जगह पर, उन लोगों के पीछे एक मुखौटा पहने आदमी आया।
उसने कुछ पलों में ही उन्हें खत्म कर दिया।
कोई चीख भी
न निकल सकी।
आख़िर यह मुखौटा पहने आदमी कौन था?
रूद्र कौन है? और उसके पीछे कौन-सी ताकत लगी है?
जानिए अगले एपिसोड में…


